
DigitalSpecial edition
कथेसर : अंक 32-35 — आदिवासी साहित्य विसेसांक
₹50
In your library as soon as you pay (PDF)
Digital copies are bought once
Also available in print₹100- Issue
- 32-35
- Period
- जनवरी–दिसम्बर 2020
- Format
- Digital · Special edition
- Language
- Rajasthani
- ISSN
- 2348-9251
- Published
- September 2020
- Editor
- Ramswaroop Kisan, Dr. Satyanarayan Soni
जनवरी–दिसम्बर 2020 रो ओ आदिवासी साहित्य विसेसांक अतिथि संपादक डॉ. जगदीश गिरी रै संपादन में छप्यो। इणमें राजस्थान रै आदिवासियां री भासावां माथै प्रो. राम लखन मीना रो सोध, हरिराम मीणा अर डॉ. अर्जुनसिंह शेखावत सूं बंतळ, हरिराम मीणा, डॉ. पिंटू कुमार अर विकास मीना री कहाणियां, कालीबाई अर भैरवलाल कालाबादल माथै लेख, कवितावां, उल्था अर मीणी लोकगीत परम्परा है।

Ramswaroop Kisan
Editor
कथेसर रा संपादक। जलम 14 अगस्त 1952। ‘बारीक बात’ सारू साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2019) अर ‘राती कणेर’ रै उल्थै सारू साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार (2003)।
More by Ramswaroop Kisan →
Dr. Satyanarayan Soni
Editor
कथेसर रा संपादन सहयोगी। एम.ए. (हिंदी अर राजस्थानी), पीएच.डी. (महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर)। राजस्थानी कहाणीकार।
More by Dr. Satyanarayan Soni →
- अतिथि संपादक री कलम सूं3
- पठेसर दीठ12
- राजस्थान रै आदिवासियां री खास-खास भासावां अर बोलियांप्रोफेसर राम लखन मीना18
- हरिराम मीणा सूं नैहनू मीणा28
- डॉ. अर्जुनसिंह शेखावत सूं डॉ. सत्यनारायण सोनी33
- महिला-आजादी रा आगीवाण गरासियाडॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी41
- बळद की मौतहरिराम मीणा44
- ज्यब बदिया बिकीडॉ. पिंटू कुमार49
- दोय छतविकास मीना53
- वीरबाला कालीबाई महाबलिदानीडॉ. हीरा मीणा58
- लोककवि भैरवलाल कालाबादलडॉ. ओम नागर62
- जुल्मीविजय सिंह मीना66
- झूंपड़ा को जूणो बळींडोचन्दा लाल चकवाला72
- पांच गीतप्रभात77
- ग़ज़ल-गीत-दूहाराम नारायण मीणा 'हलधर'81
- दोय कवितावांविजय राही85
- तीन कवितावांअमर दलपुरा87
- माड़ की छोरीरवि राहगीर89
- पूंजाडॉ. छोटूराम मीणा93
- म्हे आदिवासीसुमेधा अग्रश्री95
- दूजो अेकलव्यहरिभजन सिंह रैणू97
- आंतरी मीणी भासा में लोकगीत परम्परादिलखुश मीना99
- राजोटी-पचवारी आदिवासी लोकगीतनैहनू मीणा102
- आदिवासी मीणा समाज की करुण-कथा : जरायम-दादरसीराम लक्ष्मण मीणा108
- देहरा मांय आज ई उगै है आपणा रूंख, हाट, च मानी चमारडॉ. जगदीश गिरी113
- रात पछै परभातविनोद स्वामी129







